आखिर कब तक मैं छुपाऊंगा तुझसे अपनी चाहत को

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आखिर कब तक मैं छुपाऊंगा तुझसे अपनी चाहत को

एक दिन तो दिल की बात जुबान पर आ ही जाएगी

हम कोशिश तो बहुत करते हैं अपना दिल बहलाने की

पर शायद दिल को हमारे आपकी ही लत लग गयी है

लगता है कि लत तो ये गलत लग गयी है

सुबह उठता हूँ तो देख लेता हूँ मैं तस्वीर तेरी

फिर दिन भर मेरे बस में और कोई काम नहीं रहता

दोस्तों ने तो बहुत समझाया था मुझको

कि ये इश्क़ मुझे कहीं का नहीं छोड़ेगा

पर साहब ये दिल है कि उसके बिना कहीं बहलता नहीं

मेरा ये जिस्म भी अब मेरा नहीं रहा

इस पर भी इख़्तियार हो गया है उनका

लिख लिख कर उनकी तारीफ़ में

ना जाने कितने कागज भर डाले

अरमान हैं कि कम होने का नाम नहीं लेते

जितना भी मैं उनको भुलाने की कोशिश करता हूँ

उतनी ही तलब मेरी बढ़ जाती है उनको देखने की

कह दूँ या ना कहूं हर वक़्त यही मेरी उलझन है

कल की बात है बताता हूँ मैं आप सभी को

आ गए वो मेरे ख्वाबों में बला के खूबसूरत बन कर

फिर तो हालत मेरी कुछ दीवानो जैसे हो गयी

दिल के एक कोने में ना जाने क्यों सूनापन सा था

वो आए तो उन्होंने अपने आँचल से उजाला कर दिया

थक जाती है जब ज़िन्दगी मुश्किल वक़्त के हाथों

ऐसे में एक हमसफ़र का साथ बहुत ज़रूरी होता है

कुछ ऐसे सुनहरे पल जो मिलते हैं किस्मत से

वो आज मैंने तेरे नाम कर दिए हैं ख़ुशी से

बेचैनी तेरी लेकर अब मैं ढूंढ़ता हूँ अपनी राहत को

आखिर कब तक मैं छुपाऊंगा तुझसे अपनी चाहत को