You are currently viewing इस शहर में यूँ तो लाखों की भीड़ है पर ना जाने क्यों मैं अकेला हूँ

इस शहर में यूँ तो लाखों की भीड़ है पर ना जाने क्यों मैं अकेला हूँ

इस शहर में यूँ तो लाखों की भीड़ है पर ना जाने क्यों मैं अकेला हूँ

कोई भी नहीं ऐसा जिससे मैं कर सकूँ अपने दिल की बात

लोगों ने हमेशा से ही मेरे दिल के जज्बातों से खेला है

ना जाने क्या ढूंढ रही है मेरी नज़रे इस अनजाने से नगर में

रोज़ी रोटी की तलाश भी इंसान से ना जाने क्या क्या करवाती है

भूखे पेट को लिए ना जाने कितने लोग काट रहे है अपने रात और दिन

यहाँ पर कोई किसी को पूछने वाला नहीं सब अपने में ही मस्त हैं

इंसानियत यहाँ पर पीछे छूट गयी है और होंसले सभी के पस्त हैं

लोगों की दिन और रात सड़कों पर ही बीत जाती है

बहुत से ऐसे है जिनका ना है कोई सहारा और ना ही ठिकाना

इससे तो अच्छा अपना गाँव था भाई साहब

कम से कम लोग एक दूसरे का हाल चाल तो पूछ लेते थे

अब तो पीछे मुड़ने का भी कोई रास्ता नहीं बचा

बस अब तो मुझे आगे ही आगे बढ़ते जाना है

माना कि आज मुझे कोई नहीं जानता लोगों की भीड़ में

पर एक दिन आएगा कि हम इस शहर पर छा जायेंगे

हर महफ़िल में होंगे हमारे ही चर्चे और लोग हमें ना भूल पाएंगे

इस शहर में यूँ तो लाखों की भीड़ है पर ना जाने क्यों मैं अकेला हूँ