ज़रा सी बात पर कभी नाराज़ तो कभी खुश हो जाती ऐसी है मेरी महबूबा
मेरी महबूबा भी बहुत खूब है दोस्तों
कभी पास बुलाती है तो कभी दूर भगाती है मुझको
कभी ज़रा सी बात पर है नाराज़ हो जाती
तो कभी मुस्कुरा कर मुझपर ढेर सारा प्यार है लुटाती
कभी तो गुस्से में कह देती है मुझसे बात मत करो

और फिर कुछ देर बाद कहती है जल्दी से मुझसे मुलाकात करो
कभी मुझसे कहती है कि तुम बहुत ही बुरे हो
कभी कहती है कि तुम मुझे जान से भी प्यारे हो
उसका नाम सुनते ही मेरा चेहरा गुलाब की तरह से खिल जाता है
उसको देखकर दिल को अजीब सा सुकून मिल जाता है
दिल करता है कि मैं उसके साथ कोई एक प्यारी सी शरारत कर दूँ
वो जब हंसती है तो वीराने में भी आ जाती है बहार
इस गुलशन का हर एक भंवरा करता है बस उसका ही इंतज़ार
वो रूठे तो दिल मेरा धड़कना ही भूल जाता है
उसके मिलान के प्यार भरे गीत मेरा ये दिल हर वक़्त गाता है

उसकी झील सी आँखों में है दिल मेरा डुबा
ज़रा सी बात पर कभी नाराज़ तो कभी खुश हो जाती ऐसी है मेरी महबूबा
जब भी कभी उसका फ़ोन देर रात को आता है
तो सच कहूं कि दिल मेरा ज़ोर से धड़क जाता है
फिर तो होती है घंटों तक प्यार भरी मीठी-मीठी बातें
कभी-कभी तो ख्वाबों में ही हम कर लेते हैं मुलकातें
नाराज़ हो जाती है वो जब भी कभी मैं उससे मिलने को पहुँचता हूँ लेट
फिर कुछ देर बाद मान भी जाती है जब मैं देता हूँ उसे प्यार से चॉकलेट

जब वो खुश हो जाती है तो मैं उसको बाँहों में भर लेता हूँ
सुनकर प्यार भरे किस्से मैं उसको अपने वश में कर लेता हूँ
सच पूछो तो मेरी शरारत उसको पसंद है चाहे वो नाराज़ ही क्यों ना हो
जब मैं नहीं होता आस-पास तो लोगों से मेरा पता पूछती फिरती है
उसका रूठना होता है नकली, असल में तो उसकी नज़र मुझ पर ही रहती है
वो कहना तो चाहती है मुझे आई लव यू पर शायद कह नहीं पाती
दिन भर वो हमारी चाहत के गीत है गुनगुनाती

जब मैं उससे नहीं मिलता तो दिल उसका घबराता है
पर जब मैं आ जाऊँ सामने तो कहती है मुझसे कि तुम्हे देखकर सिर मेरा चकराता है
ना जाने हसीनो को ये अदाएं कौन सिखाता है
ना जाने कौन इनको बीच रास्ते में छोड़ने का हुनर सिखाता है
खैर आशिक़ों की किस्मत में तो हसीनों के नखरे उठाना ही लिखा है
आशिक़ों से ज्यादा बेबस इंसान भला इस दुनिया में किसको दिखा है

जब मैं अपने जज्बात दिखता हूँ तो वो मुझको दिखा देती है अपना अंगूठा
ज़रा सी बात पर कभी नाराज़ तो कभी खुश हो जाती ऐसी है मेरी महबूबा
जब भी वो मेरा दिल तोड़ कर ये कहती है कि ये तो एक मज़ाक था
तो ना जाने क्यों मैं उस पर फिर से यकीन कर लेता हूँ
कभी प्यार तो कभी तकरार की बातें याद मैं अक्सर कर लेता हूँ

जब भी मेरे प्यार के समंदर में लहरें उमड़ती हैं तो बेकाबू हो जाती हैं
तब तेरी हर एक दिलकश अदा का जादू मेरे सिर चढ़कर बोलता है
कभी-कभी वो चाँद की तरह से कभी निकलती है तो कभी बादलों में छिप जाती है
काफी नज़दीकी तो कभी उससे दूरी, ये बातें मेरे दिल को बहुत तड़पाती है
अगर मिलना है मुझसे तो फिर दिल खोलकर मिलों
जब आओ पास मेरे तो फिर जल्दी वापिस जाने की ज़िद ना करना
तुझसे मिलकर भी कुछ दूरियां बाकी रह जाना, ये है मेरे लिए एक अजुबा
ज़रा सी बात पर कभी नाराज़ तो कभी खुश हो जाती ऐसी है मेरी महबूबा
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