जो मैं चाहता हूँ वो हो नहीं रहा, जो हो रहा है वो मैं नहीं चाहता
मैंने चाहा था की ज़िन्दगी में सुकून होगा चैन होगा
कुछ ऐसे दोस्त होंगे जो मेरा हर हाल में साथ देंगे
मेरे अपने होंगे जो मेरा दुःख दर्द बाँट लेंगे
पर आज लगता है कि सबने मुँह फेर लिया है
ना वो बचपन जैसी मौज रही ना ही बेफिक्री
जब हम नंगे पाँव चल कर भी खुश थे
आज पाँव में जूते हैं तो रास्ता बदल है गया है
सोचा था कि घर होगा परिवार होगा सपने होंगे
दौड़ते दौड़ते आज बहुत दूर निकल आया हूँ
और पीछे छूट गया है घर, गाँव और परिवार
ज़िन्दगी का मकसद अब बस दो वक़्त की रोटी कमाने का है
जो मिला है बस उसी से गुजरा चलाने का है
कभी सोचा नहीं था कि तक़दीर ऐसे मोड़ पर लायेगी
जो मैं चाहता हूँ वो हो नहीं रहा, जो हो रहा है वो मैं नहीं चाहता
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