तक़दीर मुझे तूँ ले चल मेरे महबूब की गली में
ना जाने कोई कहाँ हैं मेरे दिलबर का ठिकाना
हर दिल की ख़्वाइश है उस हसीना को पाना
हुसन के जलवे बिखरे पड़े हैं उनकी गलियों में
ये सब नज़ारे लेने का है मज़ा उनकी ही गलियों में

इश्क़ वालों का ख़ुदा तो है मेरे महबूब की गलियों में
कितने नादान हैं जो इस एहसास को समझ नहीं पाते
अब क्या बिगाड़ेंगे भला मेरा ज़माने वाले
मेरे महबूब के सब नाज़ मैं उठा लूंगा ख़ुशी से
अब मुझे बेसहारा ना समझे ये ज़माने वाले
मेरा प्यारा महबूब आज मेरे साथ है
कुछ रोज़ तो गुजर हो मेरे इस इश्क़ की मस्ती में

आशिकों ने जब भी पुकारा है तुमको मस्ती में
मेरी कश्ती अब इश्क़ के गहरे पानी में उतर चुकी है
नादान हूँ मैं मुझे तो तैरना भी नहीं आता
तुम ऐसे में मेरे माझी बनकर मुझे सम्भालो
ज़बाँ से मेरे सनम बस तेरा ही नाम निकलता है
हर ज़ख्म को हंस कर सहा है तेरी उल्फत में
अब मरहम भी मुझको मिलेगा बस तेरी ही गली में
तक़दीर मुझे तूँ ले चल मेरे महबूब की गली में
Amazon Link to Buy Book:
