तुम दुखी क्यों हो ये जानता हूँ मैं
तुम्हारा ये दुःख तो बस दो कौड़ी का है
ये दुःख तुमने खुद ही अपने लिए बना रखे हैं
तुमने अपने आप को कभी नहीं बदला
वक़्त ने हर बार तुझको इशारा किया है कि सुधर हो
पर तुम्हारी आँख पर तो जैसे पट्टी बंधी है
उड़ते हुए तीर लेना छोड़ दो तुम
ऐसी दशा में तुम पूछते हो कि संसार किसने बनाया
क्या करोगे ये जान कर जब जीवन का तीर तुम्हारी छाती में घुसा है
इतनी गहरी बातें समझ पाना तुम्हारे बस की बात नहीं
झूठी गहरायी में उतर कर क्या निकल लोगे तुम
अपनी आत्मा को तो तुमने बेच दिया है बिना सोचे समझे
तुम्हारी बीमारी का इलाज़ कहीं नहीं है क्यूकि
वहम का इस दुनिया में नहीं कोई इलाज़ दोस्तों
तुम्हारे दुःख का कोई कारण नहीं ऐसा मानता हूँ मैं
तुम दुखी क्यों हो ये जानता हूँ मैं