बेसुध ज़िन्दगी: एक नयी शुरुआत

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बेसुध ज़िन्दगी कहानी है एक ऐसे शख्श की जिसे ज़िन्दगी में कभी कुछ भी पूरा नहीं मिला, मिला तो बस सब कुछ अधूरा ! ये कहानी है विजय नाम के एक व्यक्ति की ! उसका नाम तो विजय रखा था उसके माँ-बाप ने, लेकिन ज़िंदगी ने उसे हमेशा पराजय ही दी ! बचपन से लेकर जवानी तक वो तो बस हालात से लड़ता ही रहा और जब भी वो बुरे दौर से गुजर रहा था तो उसका साथ कभी भी किसी ने भी नहीं दिया ! जब – जब भी उसे खुशियां मिली , तो वो भी बस अधूरी ही मिली ! विजय का बचपन बहुत ही गरीबी में गुजरा था ! पढाई में भी वो बहुत अच्छा नहीं था ! उसको घर में गलियां और स्कूल में मास्टर जी से मार और डांट दोनों भरपूर मात्रा में मिलती थी !

जब विजय छोटा था तब वो सोचता था कि बड़ा होकर वो एक बड़ा आदमी बनेगा और कामयाब होकर एक बड़ा आदमी बनेगा और अपनी ज़िन्दगी को अपने हिसाब से जियेगी ! सच कहूँ तो वो खुली आँखों से दिन में भी सपने देखता था ! विजय कहता था कि सपने वो पुरे नहीं होते जो हम रात को देखते हैं बल्कि सपने वो पूरे होते हैं जो हमें रात को भी सोने नहीं देते !

विजय ने एक सपना देखा था बचपन में कि वो बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा ! उसके पिताजी भी यही चाहते थे कि विजय डॉक्टर बनें ! लेकिन किस्मत को तो शायद कुछ और ही मंज़ूर था ! बचपन से विजय को कविता लिखने का शौक था ! उसने पहली कविता तब लिखी जब वो पांचवी क्लास में था और उसने स्कूल में मॉर्निंग असेंबली में सभी बच्चो और टीचर्स को स्टेज से सुनाई थी ! उसकी ये कविता सुन कर सभी ने उसको बहुत सराहा था ! पहली बार विजय को एक बड़ी कामयाबी मिली थी ! उसके बाद विजय ने स्कूल में एक कविता पाठ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और उसको दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था ! धीरे – धीरे विजय अगली क्लास में आगे बढ़ता गया ! गणित के विषय में वो बहुत कमज़ोर था और हर साल फेल हो जाता था !

फिर बड़ी मुश्किल से दसवीं कक्षा में वो केवल पास ही हो पाया था ! जहाँ एक तरफ उसके दोस्त कामयाबी का जश्न मना रहे थे वही पर विजय अपने रिजल्ट से कुछ ख़ास खुश नहीं था ! घर पर भी उसको खूब डाँट पड़ी थी ! कुल मिलाकर स्कूल तक का सफर बहुत ही मुश्किलों भरा था ! जहाँ सभी बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनना चाहते थे वहीं विजय तो बस एक लेखक बनना चाहता था ! वो अपनी रचनाओं से इस दुनियाँ का दिल बहलाना चाहता था ! विजय हिंदी और इंग्लिश दोनों विषयों में काफी अच्छा था ! लेकिन उसकी इस प्रतिभा को कोई पहचान नहीं पाया और गुजरते वक़्त के साथ उसकी लेखक बनने की उम्मीद भी धूमिल हो गयी ! जैसी – तैसे करके विजय ने स्कूल की पढाई पूरी कर ली और कॉलेज की पढाई के लिए वो दूसरे शहर में चला जाता है ! और यहीं से होती है शुरुआत एक बेसुध सी ज़िन्दगी की जिसको वोआज भी जी रहा है और कर रहा है कोशिश एक नयी शुरुआत करने की !

आज विजय का कॉलेज में पहला दिन है ! वो कॉलेज के गेट पर पहुँचता है तो उसको ऐसे लगता है जैसे कि उसके सामने एक बिलकुल नई दुनिया खड़ी है ! एक ऐसी दुनिया जो बहुत ही दिलकश और हसीन है ! ये विजय का जवानी की देहलीज़ पर पहला कदम था और वो आने वाले भविष्य से बिलकुल अनजान था ! वो पीछे छोड़ आया था अपना बचपन, स्कूल और बचपन के दोस्त ! ये तो जैसे उसके किये एक नई ज़िन्दगी थी ! प्यार के कागज़ पे दिल की कलम से पहली बार सलाम लिखा, मैंने खत महबूब के नाम लिखा: शायद यही लेने उसके शायर मन ने खुद से कही होंगी ! जैसे ही विजय कॉलेज के गेट के अंदर अपना पहला कदम रखता है वो टकरा जाता है एक बहुत ही दिलकश हसीना से !

विजय: मुझे माफ़ कर देना प्लीज, क्या नाम है आपका ? मधु : मेरा नाम मधु है, कोई बात नहीं, आप जानबूझ कर थोड़ी टकराए हैं मुझसे, मधु ने शरमाते हुए कहा ! विजय भी धीरे से मुस्कुरा देता है !

विजय : आप कौन से डिपार्टमेंट में जा रही हैं ? मधु : मैं आर्ट्स डिपार्टमेंट में जा रही हूँ ! आज कॉलेज में मेरा पहला दिन है ! विजय : कमाल की बात है ! मैं भी आर्ट्स डिपार्टमेंट की तरफ जा रहा हूँ और आज मेरा भी कॉलेज में पहला दिन है ! इसका मतलब ये है कि हम दोनों का ही आज कॉलेज का पहला दिन है और हमने एक ही कोर्स में एडमिशन लिया है !

दोनों ही मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते हैं ! विजय को पहली बार मौका मिला था किसी लड़की को इतना करीब से देखने का ! उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था और प्यार का सागर हिलोरे मार रहा था ! बस ये मान लो जैसे कि विजय को पहली बार ज़िन्दगी इतनी हसीन लग रही थी ! आज इश्क़ की क़िताब का पहला पेज लिख रहा था वो ! चलते – चलते वो तो जैसे ख्यालों में खो चूका था और उसे पता ही नहीं चला कि कब वो दोनों डिपार्टमेंट पहुँच गए थे ! वहां पर ऑफिस में दोनों ने अपना एडमिशन कन्फर्म कर दिया और पहली बार वो अपनी क्लास के दरवाजे पर थे ! क्लास के भीतर से नौजवान लड़के और लड़कियों के ठहाकों की आवाज़ें आ रही थी ! विजय और मधु दोनों को क्लास के भीतर जाने में घबराहट हो रही थी ! वो दोनों ये सोच रहे थे कि कहाँ फास गए यार अब क्लास के अंदर कैसे जाएं !

इतने में ही क्लास के भीतर से विक्रम की आवाज़ आई ! विक्रम : अरे भाई देखो ये लैला – मजनू की जोड़ी कहाँ से चली आ रही है, लगता है ये दोनों यहाँ पर इश्क़ की पढाई करने आए हैं ! ये सुनते ही पूरी क्लास में ज़ोरदार ठहाका लगा और सब हसने लगे ! ये सुनकर मधु और विजय शरमा गए ! इतने में सुधा ने मधु से कहा: अरी ओ राजकुमारी यहां आओ और मेरे साथ बैठ जाओ ! और फिर मधु सुधा के पास बैठ गयी और विजय विक्रम के साथ बैठ गया ! कुछ ही देर में प्रोफेसर संजीव क्लास में प्रवेश करते हैं ! प्रोफेसर संजीव : कैसे हो सभी ? आप सभी का इस कॉलेज में आज पहला दिन है ! मैं आप सभी का इस कॉलेज में दिल से स्वागत करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप सभी इस कॉलेज से बहुत कुछ सीखकर जीवन में कुछ बड़ा करेंगे और अपने जीवन में ज़रूर कामयाब होंगे !

संजीव सर के लेक्चर के बाद लंच टाइम हो गया और सभी विद्यार्थी कॉलेज की कैंटीन की तरफ चल पड़े ! बहुत ही जल्दी विक्रम , विजय, मधु और सुधा अच्छे दोस्त बन गए थे ! जैसे ही ये चारों कैंटीन में आकर एक टेबल के चारो तरफ बैठते है, उसी वक़्त कैंटीन में रॉकी की एंट्री होती है ! वैसे आपको बताता चलूँ कि रॉकी एक बहुत ही अमीर बाप की इकलौती और बहुत ही बिगड़ैल औलाद है ! रॉकी के पापा शहर के एक जाने-माने व्यापारी हैं और उनका इस शहर में बहुत रसूक है ! यहाँ तक कि ये कॉलेज भी रॉकी के पापा के दिए हुए चंदे के पैसे से ही चला रहा है ! पूरे कॉलेज में रॉकी के आगे बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है, यहाँ तक कि कॉलेज का प्रिंसिपल भी रॉकी की जी-हज़ूरी में ही लगा रहता है ! रॉकी : अरे भाई जल्दी से मेरे लिए एक कोल्ड कॉफ़ी लेकर आओ ! इतना सुनते ही कैंटीन का मैनेजर भी रॉकी की आवभगत में लग गया !

तभी रॉकी की नज़र विक्रम, विजय, मधु और सुधा पर पड़ी ! और बस फिर क्या था, रॉकी के अंदर का शैतान जाग गया ! वो अपने कुछ दोस्तों के साथ विक्रम, विजय, मधु और सुधा के साथ जा कर बैठ गया और वो भी बिना उनकी इजाजत के ! रॉकी : उन चारों से, इस तरह क्या घूर रहे हो ! इस कॉलेज में नए आए हो, शायद इसी लिए तुम लोग रॉकी को नहीं जानते ! चलो अब जल्दी से ये टेबल खाली कर दो और चले जाओ यहाँ से, तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई इस टेबल पर बैठने की ! ये टेबल बस रॉकी के लिए ही रिजर्व्ड है ! पता नहीं कहाँ से चले आते हैं तुम जैसे गरीब लोग ! चलो, अब भागो यहाँ से ! ये सब सुनकर विक्रम और विजय को गुस्सा आ गया और वो रॉकी की तरफ बढे लेकिन तभी सुधा और मधु ने आगे बढ़कर उन दोनों को रॉकी से भिड़ने से रोक दिया और इसके बाद वो चारों कैंटीन से बाहर गार्डन की तरफ चले गए !

विक्रम: अरे यार विजय, हमें रॉकी को सबक सीखना चाहिए था ! सुधा: विक्रम, तुम्हे तो बस पंगा लेने का बहाना चाहिए ! छोड़ो भी ये बातें ! जो हुआ सो हुआ ! विक्रम: ये कसरती बदन क्या लोगों से डरने के लिए बनाया है ! एक हाथ में रॉकी का मुँह तोड़ सकता हूँ मैं समझी ! सुधा: विक्रम, मुझे तुम्हारी यही बात अच्छी नहीं लगती ! तुम बात-बात पर गुस्सा हो जाते हो ! तुमने क्या इस समाज को सुधारने का ठेका ले रखा है ! मधु: तुम ठीक कह रहे हो विक्रम, रॉकी को कोई हक़ नहीं है हमसे ऐसे बात करने का और हमें इस बात की शिकायत प्रिंसिपल साहब से करनी चाहिए ! विजय: मुझे ऐसा लगता है कि इस बात को हम बेवजह ही ज्यादा तूल दे रहे हैं ! हमें रॉकी को एक मौका और देना चाहिए और आज तो हम सब के कॉलेज का पहला दिन है तो कम से कम आज तो हमें किसी की शिकायत करने से बचना चाहिए ! सुधा: तुम ठीक कह रहे हो विक्रम, हमें रॉकी को एक मौका और देना चाहिए ! अरे ये क्या ? हमारी अगली क्लास का वक़्त हो गया, जल्दी करो ! चलो सभी क्लास में वापिस चलते हैं दोस्तों ! और फिर कॉलेज की छुट्टी का समय हो गया ! चारों दोस्त एक दूसरे को बाय करते हैं और कॉलेज के गेट से बहार निकल जाते हैं अपने-अपने हॉस्टल में जाने के लिए ! और दोस्तों ये भी एक अजीब इत्तेफ़ाक़ था कि मधु और सुधा को एक ही कमरा मिला, वहीं विजय और विक्रम को एक ही कमरा मिला ! और इस तरह कॉलेज के पहले दिन का अंत हुआ और चारों ने एक दूसरे को गुड नाईट कहा और नींद के आगोश में चले गए !

अगले दिन सुबह उठते ही विजय ने अपने दिन की शुरुआत पूजा-पाठ से की और अपने सुखद भविष्य की कामना की ! विजय के सपने बहुत ऊँचे थे ! वो दुनिया से कुछ अलग करना चाहता था और अपना नाम कमाना चाहता था ! इसी उधेड़बुन में एक और दिन की शुरुआत हो गयी ! कॉलेज का एक और दिन, चारों दोस्त फिर से एक साथ थे ! जैसे ही वो कैंटीन के पास से गुजर रहे थे, उसी वक़्त रॉकी ने अपने दोस्तों के साथ उनका रास्ता रोक लिया ! रॉकी: कहाँ जा रहे हो तुम सभी? कभी कुछ वक़्त हमारे साथ भी गुजार लिया करो ! क्या करोगे इतना पढ़कर? लाओ सभी अपनी किताबें मुझे दे दो? आओ चलो कुछ मस्ती हो जाए? रॉकी: अरे विक्रम, बॉडी बिल्डर कैसे हो? तुम्हारी ये बॉडी किसी काम की नहीं ! तुम जैसे बॉडी बिल्डर्स मेरी जेब में रहते हैं समझे ! जाओ और जाकर मेरे लिए एक सिगरेट लेकर आओ ! विक्रम गुस्से से लाल हो जाता है और रॉकी की तरफ घूरता है ! रॉकी: घूरता क्यों है रे, मसल के रख दूंगा, समझे ! इतना सुनते ही विक्रम का खून खौल उठा और उसने रॉकी का कॉलर पकड़ लिया और उसको एक ज़ोरदार घूँसा जड़ दिया ! इसके साथ ही कॉलेज कैंपस में एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी ! रॉकी सब के बीच में पड़ा कराह रहा था ! विक्रम तो जैसे एक हीरो बन चूका था, सभी लड़कियों की ज़ुबान पर उसका ही नाम था ! इसी बीच ये बात प्रिंसिपल साहब तक पहुंच गयी और उन्होंने इस सभी को अपने ऑफिस में बुला लिया ! प्रिंसिपल: मैं आज तुम सभी को एक सप्ताह के लिए कॉलेज से निलंबित करता हूँ और अगर ऐसा दोबारा किया तो हमेशा के लिए कॉलेज से भी निकल दूंगा, समझे !