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मेरी ये गरीबी कहीं मेरे होंसले ना पस्त कर दे

मेरी ये गरीबी कहीं मेरे होंसले ना पस्त कर दे

आख़िर कब तक लडूंगा मैं इस ज़माने से

कमाने के लिए तो नहीं मिलता मुझे कोई मौका

और हज़ारों ख़र्चे हर रोज़ रहते हैं तैयार

मुफ़लिसी ऐसी मेरे ख़ुदा किसी को ना देना

कि जब हर साँस किसी के क़र्ज़ तले दबी हो

जिस किसी ने भी मेरी थोड़ी सी मदद की है

तो हर उस इंसान ने मुझे अपना गुलाम बनाना चाहा

ना जाने ये सफर और ये तन्हाई क्या कर दे

दोस्त भी मिलते हैं अब खुदगर्ज़ी से भरे हुए

गले मिलना भी अब मुमकिन ना रहा यारों

क्या पता कौन सी मुलाकात आखिरी साबित हो

जब भी लगता है इल्ज़ाम किसी पर भूख से मरने का

तो उसके पीछे भी एक अजीब सी दास्तान होती है

पिला दे मुझको साक़ी ऐसी मय जो मुझे मस्त कर दे

मेरी ये गरीबी कहीं मेरे होंसले ना पस्त कर दे