मैं आज वक़्त की सीमाओं से परे निकल जाना चाहता हूँ
क्या सोचना है कल क्या होगा
ये सोचना भी अब पीछे छूट गया है
क्या तुम मेरे अपने हो या फिर कोई गैर
इस बात से भी ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता
भीड़ हो या फिर तन्हाई हो कोई बात नहीं
मुझे अब अकेले चलने का हुनर सीखना होगा
तेरी मस्त निगाहों से पीने को अब नहीं बेकरार मैं
आगे और पीछे बस एक अजीब सी तन्हाई है
क्या होगा किसी के पीछे भाग कर
अब यहीं ठहर कर मैं एक नया घर बसाना चाहता हूँ
तेरी गोरी-गोरी बाहें फिर से बुला रही हैं मुझको
क्या तुम अब भी मेरा इंतज़ार करती हो
तेरी उम्मीद अब नहीं मुझको
मुझे अब बस खुद से ही मिलना है
वक़्त की सुइंयाँ तेजी से भाग रही हैं
तेरे नर्म होठों पर फिर से आज पिघल जाना चाहता हूँ
मैं आज वक़्त की सीमाओं से परे निकल जाना चाहता हूँ
