You are currently viewing ये जो आसमान से भी ऊँची हसरतें हैं इंसान की

ये जो आसमान से भी ऊँची हसरतें हैं इंसान की

ये जो आसमान से भी ऊँची हसरतें हैं इंसान की

ना जाने कहाँ जाकर थमेंगी लहरें इस तूफान की

क्या क्या ख्वाब सजाते हैं हम और क्या है हक़ीक़त

इस शहर में आया था हर शख्श आबाद होने को

कुछ तो यहाँ पर बन गए और बहुत से हैं बर्बाद होने को

रेशमी जुल्फों से खेलने वाले आजकल कम ही हैं

बहुत से तो बस पैसे और शोहरत से ही खेलते हैं

ना जाने कैसी अजीब सी ख़ामोशी है इन गाड़ियों के शोर में

पैदल चलने वालों की गिनती अब कहीं नहीं होती

बीच रास्ते पर ज़िन्दगी दम तोड़ती है

और लोग बस तमाशबीन की तरह देखते रह जाते हैं

ये कैसा सूनापन है चौराहों पर और इंसानियत शर्मसार हो जाती है

मेरे शहर वालों का मिजाज आजकल कुछ बदला बदला सा है

कस्मे, वादे, प्यार, वफ़ा सब पीछे ही छूट गए हैं जैसे

बस चारों तरफ होड़ मची है नोट कमाने की

वफ़ा और बेवफा में अब कोई फर्क बाकी ना रहा

नहीं वक़्त किसी के पास भी दो पल ठहर जाने का

अगर कोई अजनबी रास्ता पूछना चाहे तो किस से पूछे

पता नहीं किसी को कि इस शहर में क्या सही है और क्या गलत

सभी का अपना अपना अलग पैमाना है

कभी कभी तो दम सा घुटता है इन ऊँची ऊँची इमारतों में

दिल और दिमाग भी अब तो जैसे सुन्न होने लगा है

महफ़िलें भी अब तनहा तनहा सी है यार की

ना अब चार यार कहीं मिलते हैं ना ही बातें होती हैं प्यार की

सब कुछ बिक सा गया है आजकल चौखट पर दुकान की

ये जो आसमान से भी ऊँची हसरतें हैं इंसान की