
रुक जाऊं या चलता रहूं मैं हर रोज़ ये सोचता हूँ
दूर तक कोई उम्मीद नहीं नज़र नहीं आती फिर भी
ना जाने क्यों हर रोज़ एक नयी शुरुआत करता हूँ मैं
कभी लगता है कि हार मान लूँ फिर ये सोचता हूँ कि बस एक बार और
हर कदम के साथ मुश्किलें भी बढ़ती जाती हैं
क्या कहूं मेरे हमसफ़र अब तो हर सांस के साथ आह निकलती है
बरसों हो गए हैं बस एक ख़ुशी के इंतज़ार में
ये कैसी परीक्षा है जो कभी ख़तम ही नहीं होती
ये कैसा इंतज़ार है जो कभी ख़तम ही नहीं होता
गुलाब से खुशबू आखिर कब तक दूर रहेगी
तेरे लिए मेरी मोहब्बत आखिर कब तक मज़बूर रहेगी
ना जाने कितना लम्बा है सफर ज़िन्दगी का
हर बार मंज़िल के पास पहुँच कर एक नया सफर शुरू हो जाता है
हर रात जब सब खो जाते हैं तो मैं तेरे ख्यालों में खोता हूँ
रुक जाऊं या चलता रहूं मैं हर रोज़ ये सोचता हूँ
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