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वक़्त की ये अंधी दौड़ ना जाने इंसान को कहाँ लेकर जाएगी

वक़्त की ये अंधी दौड़ ना जाने इंसान को कहाँ लेकर जाएगी

ना दिन का पता और ना ही रात की है कोई खबर

बस भाग रहे हैं लोग ना जाने किस मंज़िल की तलाश में

आँखें हैं सब की सूनी सूनी सी आजकल ना जाने क्यों

सपनों की खातिर वो अपनों को पीछे छोड़ आए हैं

जब चलना शुरू किया था तो बस दो वक़्त की रोटी की ही तलाश थी

आज गाड़ी बंगला धन दौलत सब कुछ तो पा लिया हैं

पर आँखों से जैसे सब की नींद रूठ सी गयी हैं

किसी गरीब को नहीं देता कोई चार आने भी आजकल

वो बात और हैं कि महफ़िल में लाखों लुटाये जाते हैं

पर इतने सब पर भी किसी को भी सुकून नहीं अपनी ज़िन्दगी में

इन आसमान से ऊँची इमारतों में रहने वालों का दिल अब छोटा हो गया हैं

पैसे की ख़ातिर इंसान अब इंसान से बहुत दूर हो रहा हैं

अपनों में बेगाना हैं पर गैरों में मशहूर हो रहा हैं

कामयाबी के शिखर पर भी ये लोग तनहा हैं उदास हैं

किसी से मिलने का वक़्त नहीं अब इनके पास हैं

मशीन के इस युग में जज्बात की कोई जगह नहीं बची आज

अब भी मौका हैं संभल जाओ ये ज़िन्दगी जो बीत गयी तो फिर नहीं आएगी

वक़्त की ये अंधी दौड़ ना जाने इंसान को कहाँ लेकर जाएगी