दिल की सुनें या ज़माने की, तुम ही बता दो मेरे महबूब
कब से ये दिल मेरा तड़प रहा था तेरे इंतज़ार में
कि फूल खिलेंगे मेरे वीरान आँगन में अबकी बहार में
बाँहों में भर लेना और फिर जुदा हो जाना
ये कैसी फितरत है तुम्हारी जाने जाना
बहुत दिन हो गए हैं तेरी मस्त आँखों से पिये हुए
छलका दो आज अपनी मदहोश जवानी का जाम
वैसे तो मैं जी लूंगा चाहे जैसे भी हों मेरे हालात
पर क्या करूँ कि अब काबू में नहीं रहते मेरे जज्बात

मेरी दीवानगी के किस्से अब पुरे शहर में मशहूर हैं
लोग पूछते हैं हमसे कि ये हाल हमारा किसने किया है
कभी-कभी सोचता हूँ कि ले दूँ नाम तुम्हारा सबके सामने
पर फिर सोचता हूँ कि रुस्वा ना करूँ हमारी मोहब्बत को सरे-बाजार
मुस्कुराने का हुनर तो हमें भी आता है जनाब
पर क्या करें कि दिल अब किसी बात से बहलता नहीं
सुना है कि अब हम उनके इश्क़ के काबिल नहीं रहे

खैर जो हुआ वो भी अच्छा ही हुआ दोस्तों
हम तो अब भी हैं उनकी अदाओं के आशिक़
लेकिन वो कहते हैं कि वो अब नहीं हैं हमारे माशूक़
दिल की सुनें या ज़माने की, तुम ही बता दो मेरे महबूब
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