चंद पैसे कमाने की खातिर मैं अपनों को पीछे छोड़ आया हूँ, अब आगे ना जाने क्या होगा

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चंद पैसे कमाने की खातिर मैं अपनों को पीछे छोड़ आया हूँ, अब आगे ना जाने क्या होगा

कभी जब रहता था गाँव के एक छोटे से घर मैं, तो पेट भर भोजन करना भी एक सपना था

बहुत अधिक अभाव था जीवन में सुख-सुविधाओं का, हर वक़्त भविष्य की चिंता रहती थी

पर इन सबके बीच जीवन में कुछ सुकून के पल तो मैं ढूंढ कर ले आता था

यार-दोस्तों के साथ नदी के किनारे-किनारे बस यूँ ही मीलों तक पैदल चला जाता था

जब भी गाँव में कोई शादी होती तो खूब खाने को मिलते थे तरह-तरह के पकवान

कभी-कभी किसी खास मौके पर ही मिलते थे नए कपड़े, और बढ़ जाती थी मेरी शान

गाँव के स्कूल के मास्टरजी भी बहुत ही गजब के होते थे

पढाई-लिखाई कम और डंडे की भाषा से अधिक बोलते थे

रोज़-रोज़ मुर्गा बन जाना तो जैसे मेरा जनम सिद्ध अधिकार था

लेकिन कुछ भी कहो, फिर भी मुझे अपने स्कूल से बहुत प्यार था

वो तालाब में नहाना दोस्तों के साथ बहुत याद आता है

माँ की डाँट फटकार और उसके बाद ढेर सारा दुलार मुझे मेरे गाँव के नज़दीक ले आता है

धीरे-धीरे बचपन बीता और मैं बड़ा हो गया, तब सोचा कि बचपन ही अच्छा था

बचपन में ना कोई नौकरी की चिंता थी और ना ही अपनों के सपने सच करने का कोई दबाव था

खैर ज़िन्दगी का पहिया तो अपने हिसाब से ही घूमता है इसे आज-तक भला कौन रोक पाया है

मेरी ज़िन्दगी के मालिक आपको हज़ारों सलाम, आपके रहम से ही मैंने अपना अभावग्रस्त जीवन खूबसूरत बनाया है

जाने कब ये ज़िन्दगी मुझे इस मोड़ पर ले आयी कि कुछ काम करने की मज़बूरी मेरे दिल पर थी छाई

अपने माँ-बाप की बढ़ती उमर और घर की ज़िम्मेदारियाँ मुझे अब गाँव से शहर ले आई

गाँव मेरा पीछे छूट गया और मैं शहर की और जाने वाली बस में बैठ कर अपनों को पीछे छूटते देखता रहा

अब आगे बढ़ने के सिवा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं

वापिस लौटने का ख्याल भी ना जाने कब इस दिल से निकल गया होगा

चंद पैसे कमाने की खातिर मैं अपनों को पीछे छोड़ आया हूँ, अब आगे ना जाने क्या होगा

जैसे ही शहर में रखा अपना पहला कदम तो चारों तरफ मची अफरा-तफरी से दिल मेरा कुछ घबराया

उस अनजान शहर में वैसे तो लाखों लोगों की भीड़ थी पर कहने को अपना तो एक भी ना था

दिन-रात लोगों की हसरतें इन शहर वालों को कभी चैन से सोने नहीं देती

ना जाने ये मीलों लम्बे सफर कब जाकर अपनी मंज़िल पर पहुंचेंगे

खैर मैं भी शामिल हो गया इस शहर के लोगों की भीड़ में अपनी किस्मत चमकाने के लिए

बड़ी मुश्किल से सर छुपाने के लिए एक ठिकाना मिला, जिसमे एक छोटी सी खिड़की थी बाहर झाँकने के लिए

उस खिड़की से मैं हर रोज़ सूरज को उगते और चाँद-सितारों को निकलते हुए देखता था

दिन भर तो मेरा काम की तलाश में निकल जाता था पर रात में अकेलापन और तन्हाई मुझे घेर लेती थी

फिर एक दिन मुझे किसी सेठ ने अपने यहाँ एक छोटी सी नौकरी देकर मेरी ज़िन्दगी बदल दी थी

दिन-रात एक करके मैंने मेहनत और ईमानदारी से खूब काम किया और अपने मालिक का दिल जीत लिया

धीरे-धीरे मेरे काम और कामयाबी के चर्चे पूरे शहर में होने लगे और मैं लोगों की नज़रों में आने लगा

अब मैं काम को पूरी तरह से समझ चूका था और मेरा दिल अब ख़ुशी के गीत गाने लगा था

बीच-बीच में घर वाले पूछते रहे कि बेटा घर कब आओगे और मैं कुछ ना कह पाता था

काम में रहता था हर वक़्त मशगूल और घर पे जाने की बजाये बस पैसे ही भेज पाता था

ना दिन का होश था और ना रात का, मेरे जीने का मकसद तो जैसे बन गया था काम ही काम

कुछ वक़्त तक तो ये दौलत और शोहरत मुझे बड़ी अच्छी लगी और मैं रहा बहुत ही प्रसन्न

अब मेरे बन गए थे बहुत से दोस्त जो दिन-रात मुझे घेरे रहते थे

इस शहर पर एक दिन तुम राज़ करोगे, ऐसा वो मुझसे हर वक़्त कहते थे

उनका कहना भी वाकई सच साबित हुआ और पूरे शहर की दौलत और शानो-शौकत अब मेरे क़दमों में थी

अब गाँव में कभी-कभी ही जाना हो पाता था, माँ-बाप को मैं अपने साथ शहर चलने को कहता था

पर वो कहते कि अब हमारा मन तो गाँव में ही लगता है, तुम्हे तुम्हारा शहर मुबारक हो

ज़िन्दगी बीत रही थी मौज़ में, जवानी की रंगीनियां भी पूरी तरह से मुझ पर मेहरबान थी

हर रोज़ रात को हसीनो के जलवों के साथ और दोस्तों के साथ मस्ती करना, यही मेरी पहचान थी

फिर धीरे-धीरे काम करते-करते ना जाने कब जवानी भी मुझसे दामन छुड़ाने लगी

सर पर कुछ सफ़ेद बाल और चेहरे पर झुर्रियां अब जैसे साफ़ नज़र आने लगी

फिर एक दिन अचानक तबियत मेरी बिगड़ी, और डॉक्टर ने कहाँ कि अब काम कम और आराम ज्यादा करना होगा

चंद पैसे कमाने की खातिर मैं अपनों को पीछे छोड़ आया हूँ, अब आगे ना जाने क्या होगा

जब डॉक्टर की बात को मैंने सुना तो मैं तो जैसे हो गया था हैरान और परेशान

मेरी ज़िन्दगी की उठा-पटक ने मेरे दिल पर जैसे छोड़े थे कुछ ज़्यादा ही गहरे निशान

बहुत सोचा मैंने की शहर में ही रुकूँ या फिर वापिस अपने गांव लौट जाऊँ

पैसा तो मैंने बहुत कमा लिया है पर जो दिल मांगता है वो सुकून कहाँ से लाऊँ

फिर एक दिन अचानक मुझे पाता चला कि पिता जी बहुत बीमार है और उनको है मेरी बहुत ज़रूरत

जैसे ही मैं घर पर पहुंचा तो दिल मेरा जैसे रो पड़ा, देखकर माताजी की रोनी सूरत 

माँ बोली बेटा तूने पैसा है बहुत कमाया, पर हमें पैसा नहीं बस तेरा प्यार ही चाहिए

अगर हो सके तो अब वापिस शहर मत जाना, हमें तुझसे और कुछ नहीं चाहिए, बस तेरा साथ चाहिए

ये सब सुनकर मेरी आँखों से आंसू बह निकले और शहर वापिस जाने का ख्याल भी मैंने दिल से निकाल दिया

मेरे इस फैसले से सभी बहुत खुश थे क्यूंकि अब फिरसे मैं रहूँगा अपने गांव में और यहीं मेरा आखरी ठिकाना होगा

चंद पैसे कमाने की खातिर मैं अपनों को पीछे छोड़ आया हूँ, अब आगे ना जाने क्या होगा

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