मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर मैं अपनी राह खुद ही बना लूंगा
मेरी साँसों की डोर को मैंने कर दिया है हालात के हवाले
अब मुझे कोई उम्मीद नहीं किसी से चाहे मुझे कोई ना संभाले
बहुत थक चूका हूँ मैं रिश्तों का बोझ उठाते-उठाते
मतलबी हैं लोग यहाँ पर वो कभी भी गिरते को नहीं उठाते

क्या करूँ मैं अब इन अधूरी आशाओं का जब जीवन में ही निराशा हो
कैसे मैं शराफत को संभाल के रखूं जब मेरा जीवन एक तमाशा हो
आज तुम आए तो हो लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है
दिल को मेरे अब नहीं बहलाती ये प्यार और वफ़ा की बातें
अब दिलरुबा पर कोई भरोसा नहीं चाहे रोज़ हो मुलाकातें
कैसे भूल जाऊँ मैं कि सबने मिलकर मेरे दिल को कितना है दुखाया
नहीं चाहिए मुझे दया की भीख चाहे अपना हो या फिर पराया

नहीं है दरकार मुझको चाँद और सितारों की अब
रौशनी ना मिली तो कोई बात नहीं मेरे दोस्त
अपनी इस सुनसान ज़िन्दगी को मैं अब अंधेरों से ही सजा लूंगा
मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर मैं अपनी राह खुद ही बना लूंगा
ये माना की मेरा ये जीवन अब कभी ना खत्म होने वाला संघर्ष है
दुःख भरी आंधियां हर पल करती अब मुझको स्पर्श हैं

सोच लिया हैं मैंने कि अब मुझको मेरे दर्द में हो डूबना हैं
छोड़ रहा हूँ ये शहर भी अब मैं आज रात को
और इस बात की मुझको नहीं देनी किसी को सूचना हैं
ये दुनिया और ये महफ़िल भी अब मेरे किसी काम की नही
कौन गलत हैं और कौन हैं सही
मुझे इस बात से कोई मतलब नही
मैंने करीब से देखा हैं अपने सपनों के महल को टूटते हुए
और देखा हैं खुद को ज़माने की भीड़ में पीछे छुटते हुए

बहुत बार समझाया हैं मैंने ये खुद को कि कोई किसी का नही होता
पर फिर भी मेरे आंसुओं का सैलाब हैं कि थमने का नाम नही लेता
टूटे हुए सपनों की पुकार अब चारों तरफ सुनाई देती हैं
जहाँ भी मैं देखता हूँ वहां पर बस धुंध की एक चादर सी दिखाई देती हैं
ऐसे लगता हैं कि जैसे रात ने निगल लिया हो सुबह को
बीते हुए वक़्त की यादें ही अब मेरे जीने का एक मात्र सहारा हैं

अब खुद ही मैं अपने ज़ख्मों पर मरहम लगा लूंगा
मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर मैं अपनी राह खुद ही बना लूंगा
मुझसे क्या पूछते हो मेरा हाल-ऐ-दिल अब तुम लोग
ज़ख्म जो भी मिले हैं मुझको वो सब तुम लोगों ने ही तो दिए हैं
तुम्हारी हमदर्दी और दिलासा भी मुझको एक मज़ाक सा लगता हैं
मेरी चुप्पी और आंसुओं की भाषा को भला कौन समझ सकता हैं

अगर आज मैं गिरा हूँ तो क्या खुद ही उठना हैं मुझको
क्यूंकि लोग जब सहारा देते हैं तो एहसान जाता देते हैं
मेरा आत्म-सम्मान ही मेरी असली दौलत हैं जिसको कोई नही चुरा सकता
ये ज़िन्दगी मेरी जैसे एक जंग हैं जिसमे कोई भी मुझे अब हरा नही सकता
मुझे ये अब क्या पता कि किसके मन में मेरे लिए क्या हैं
इसीलिए मेरे अकेलेपन को ही मैंने अब अपना साथी बना लिया हैं

जब कोई नही होता आस-पास तो तन्हाई का आँचल ओढ़ कर सो जाता हूँ
दुनिया चाहे कुछ भी कहे पर मैं तो खुद को हर पल अकेला ही पता हूँ
दिल का बोझ मेरा कोई भी हल्का नहीं कर सकता
चाहे सुख में कटे या दुःख में बसर हो जीना तो अब हर हाल में होगा
मेरी अधूरी कहानी और बदनसीबी का जिक्र अब हर महफ़िल में होगा

ये खालीपन भी अब मुझको अजीब नही लगता
जीवन की कठिनाइयों से अब मैं भागता नही
खुद को कोसकर अब हरगिज़ ना मैं खुद को सजा दूंगा
मुझे छोड़ दो मेरे हाल पर मैं अपनी राह खुद ही बना लूंगा
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