कोई अगर दिल को आवाज़ दे तो क्या करूँ

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कोई अगर दिल को आवाज़ दे तो क्या करूँ

दिल में मेरे नहीं है अब कोई भी अरमान मैं क्या करूँ

बड़ी हसरत थी की कोई हो मेरा हमसफ़र

पर शायद किस्मत को तो कुछ और ही मंज़ूर था

ख़ाली हैं हाथ मेरे और मायूसी है छायी इस दिल में

याद करता हूँ जब मैं अपने गुज़रे हुऐ कल को

कभी जो तुम्हारा दिल धड़कता था मेरे लिए

आज क्या बात है अनजान बन गए हो

बात करना तो दूर नज़रे भी नहीं मिलते मुझसे तुम

समझ नहीं आता ऐ खुदा की तेरी मर्ज़ी क्या है

जब एक दिन मुझे तन्हा होना ही था

और अपनी फूटी किस्मत पर रोना ही था

भीगी पलकें और रूठा है आसमान तो मैं क्या करूँ

दिल में मेरे नहीं है अब कोई भी अरमान मैं क्या करूँ

कोई अगर दिल को आवाज़ दे तो क्या करूँ