जज़्बात मेरे दिल के मैं उसे कभी बता ना सका
पता नहीं क्या क्या इस दिल में छुपा रखा था मैंने
ख्वाबों में जब भी उसको देखा तो मैं मचल गया
एक अनछुए एहसास से मैं पिंघल गया
आँखों आँखों में जब बात होने लगी तो जुबाँ का क्या काम

कर दिया उसकी एक नज़र ने मेरा नींद चैन हराम
रात को जब चाँद आसमां पर निकलता है
तो वो भी तेरे आगे कुछ फ़ीका सा लगता है
इस बात की ग्वाही सितारे भी देते हैं

सोचा था की एक ख़त में लिख दूंगा दिल की बातें
पर लिखने बैठा तो अलफ़ाज़ ही काम पड़ गए
ना जाने की कब वो कुछ देर को आये और चले भी गए
और मैं फिर से एक बार उसकी ही यादों में खो गया
जज़्बात मेरे दिल के मैं उसे कभी बता ना सका
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