जो मंज़िल पर पहुंचा दे वो हौंसला कहाँ से लाऊँ

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जो मंज़िल पर पहुंचा दे वो हौंसला कहाँ से लाऊँ
ढूंढ़ता फिर रहा हूँ मैं अपने भीतर कई सवालों के जवाब
इन जवाबों को पाने के चक्कर में घूम रहा हूँ बेहिसाब
मेरी तक़दीर भी ना जाने क्या रंग लाएगी
जो भी खवाब देखता हूँ वो ना जाने कहाँ खो जाते हैं
आइये आपका इंतज़ार था ना जाने कब से
तुमने कहा था कि एक रोज़ तुम मिलोगे पर तुम ना आए
अकेले ये सफर अब कटना मुश्किल है
दे रहा हूँ तुमको अपना दिल तोहफे मैं रखना इसको संभाल कर
तुम तो मंज़िल पर पहुँच गया पर मैं कहीं पीछे छूट गया हूँ
कोई नहीं है जिसको आवाज़ दूँ, इस सफर का बस मैं अकेला ही मुसाफिर हूँ
ज़िन्दगी की गाड़ी मुझे छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी है
मेरे हक़ में जो हो जाये अब वो फैसला कहाँ से लाऊँ
जो मंज़िल पर पहुंचा दे वो हौंसला कहाँ से लाऊँ

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