तुम कहीं किसी और की ना हो जाओ यही सोचकर डरता हूँ मैं
जब भी तुम्हे देखता हूँ तो ना जाने कितनी आहें भरता हूँ मैं
तुम तो रहती हो अपने ही दोस्तों में हर वक़्त
पर मैं तो यहाँ तनहा और अकेला हूँ
मेरा संगी और साथी कोई नहीं ज़माने में
इश्क़ वाली किताब तो नहीं पढ़ी हमने कभी
पर प्यार क्या है ये महसूस करता हूँ मैं
ये बेचैनी का आलम मुझे रात भर जगाता है
लोगों के ताने हमेशा मेरे दिल को छलनी करते हैं
ये माना मैंने कि तुमसे इश्क़ करने की ख़ता हमने की है
पर क्या करें दिल पर कब किसी का जोर चलता है
ये बाली उमर का प्यार याद रहता है सारी उमर
इश्क़ हो जायेगा मुझको तुमसे मैंने तो ये नहीं सोचा था कभी
दिल लगा कर आज पता चला कि आशिकी क्या होती है
क्यों लोग दीवाने हो जाते हैं और दीदार ऐ सनम ही मांगते हैं
ऐ मेरे ख़ुदा अब मेरा ख्याल रखना मुझे प्रेम रोग हो गया हैं
मैं उसी से राज़ ऐ दिल छुपाता हूँ जिस हसीना पर मैं मरता हूँ
तुम कहीं किसी और की ना हो जाओ यही सोचकर डरता हूँ मैं
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