ना रहने को घर है ना सोने को बिस्तर है मेरी जिंदगी का यही है फ़साना
आज यहाँ पर तो कल कहीं पर मेरा तो नहीं है कहीं पर कोई ठिकाना
जो कह कर गए थे कि मिलते हैं वो आज तक लोट कर नहीं आये
ज़िन्दगी गुजर रही थी ख्यालों में ही और साथ हैं मेरे ग़म के साये
अपने दिल के हालात अब कहूं तो मैं कहूं किसको सुनने वाला कोई नहीं
कैसी अजीब सी ख़ामोशी हैं इस शहर में या ख़ुदा
हर शख्श यहाँ पर बस अपने में ही सिमटा हुआ है
किसी के पास भी वक़्त नहीं किसी के लिए भी इस दौर में
कहानी सबकी अपनी अपनी है पर पर सुनने वाला कोई नहीं
मैंने तो यही देखा हैं अब तक कि जो अपने से लगते हैं वो गैर निकले
कुछ तो डूब गए ग़म के समंदर मैं तो कुछ मुश्किल से तैर निकले
खैर सोचता हूँ कि अभी ज़िंदा हूँ तो उम्मीद भी कर सकता हूँ
खुशियाँ ना मिले तो ना सही अपना दामन ग़म से तो भर सकता हूँ
कभी किसी मोड़ पर मिला ख़ुदा तो अपनी खता पूछ लूँगा
क्या कोई इतना भी तड़पाता हैं किसी को एक गुनाह के लिए
अब तुम्हारे ही हाथों मेरे जीवन कि डोर हैं इसको अब आप ही निभाना
ना रहने को घर है ना सोने को बिस्तर है मेरी जिंदगी का यही है फ़साना
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