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आज मैं निकल पड़ा हूँ बहुत दूर के सफर पर

आज मैं निकल पड़ा हूँ बहुत दूर के सफर पर

ये सफर कुछ ऐसा है कि ना तो सामान है

और ना ही किसी भी तरह की कोई तैयारी है

ये सफर हर मायने में कुछ अलग सा है

मैं काफी दिनों से कुछ ऐसा करना चाहता था

पर आज एकाएक मेरे दिल में ये बात आयी

और मैंने इरादा किया है कहीं दूर जाने का

ये एक ऐसा सफर है जिसको मेरा शरीर नहीं

बल्कि मेरी रूह तय करना चाहती है

इस सफर में ना तो किसी टिकट की ज़रूरत पड़ेगी

ना ही रहने के लिए किसी ठिकाने की

जज्बातों का होगा हवाई जहाज इसमें

ख्वाहिशों का होगा होटल मेरे ठहरने के लिए

नजारों की भी कोई कमी ना होगी इसमें

पर्वत, नदियाँ और झरने सभी रहेंगे हाज़िर

खिदमत में मेरी होंगी तितलियाँ भी बेकरार

जी करता है अब ये मेरा कि इन फूलों और बगीचों पर

मैं लेट जाऊं सूरज की किरणों की चादर बिछाकर

मैं रंग भरना चाहता हूँ अपने जीवन में इंद्रधनुष से

सात रंग तो ले लूंगा मैं ऐसा करके

पर में ये चाहता हूँ रंग मेरे लिए अनगिनत हो

खुदा कि बनाई इस दुनिया में मैं

कहीं दूर जाना चाहता हूँ

शहरों से दूर और गाँवों से भी बहुत दूर

रिश्तों से भी दूर और नातों से भी दूर

मैं होना चाहता हूँ इन सब बंधनों से आज़ाद

ये दुनिया भर के रीति रिवाज़ों को मैं

शायद कभी भी नहीं निभा पाउँगा कभी

बारिश के ठण्डे पानी से मैं

अपने गर्म दिल को सुकून देना चाहता हूँ

शहरों की ऊँची इमारतों से दूर

घास के इन हरे हरे मैदानों में

मैं झरनों का संगीत सुनना चाहता हूँ

पक्षियों की चहचहाहट भी कुछ मीठी मीठी सी है

घोंसला अपना भी एक बना लूँ अगर

मैं भी उनके साथ और उसी पेड़ पर

तो शायद मेरे दिल को कुछ सुकून मिले

इतना सब कुछ कर लेने पर ही

शायद मैं अपने आप से मुलाकात कर पाउँगा

अभी तो मैं लापता सा रहता हूँ कसम से

ये जो सफर है मेरा ये तो है

खुद में ही खुद को तलाशने का

इसीलिए आज मैं ये कह रहा हूँ कि

आज मैं निकल पड़ा हूँ बहुत दूर के सफर पर