दिल की सुनें या ज़माने की, तुम ही बता दो मेरे महबूब
दिल की सुनें या ज़माने की, तुम ही बता दो मेरे महबूब कब से ये दिल मेरा तड़प रहा था तेरे इंतज़ार में कि फूल खिलेंगे मेरे वीरान आँगन में…
दिल की सुनें या ज़माने की, तुम ही बता दो मेरे महबूब कब से ये दिल मेरा तड़प रहा था तेरे इंतज़ार में कि फूल खिलेंगे मेरे वीरान आँगन में…
अगर मेरी महबूबा आज मुझसे रूठी है तो कल मान भी जाएगी तेरे इस मायूस चेहरे पे फिर से एक प्यारी सी मुस्कान आ जाएगी चलते-चलते इस जिंदगी में सब…
तेरे ख्वाबों की उड़ान आसमान से ऊँची होनी चाहिए अगर कुछ बड़ा करना है तो अपनी सोच का दायरा बढ़ा दो शुरुआत तेरी भी होगी एक छोटे से कदम से…
इस अँधेरी रात में तूँ उम्मीद का दीया जला कर तो देख ये माना कि अब तक तुझे कभी कोई भी कामयाबी नहीं मिली बरसों से एक लम्बा सफर तय…